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freedom

वाह की क्यूँ चाह हो, बस कर्म ध्येय मन्त्र हो |

बन्ध से मुक्त भाव हर, निर्माण को स्वतंत्र हो ||

तम निशा भी घोर हो, गरज मेघ करते शोर हों |

है शक्त कहाँ जो रोक ले, होना नवल भोर को ||

चीर कर हर आपदा, अरुणाभ होता प्राची चीर है,

धार वीर धीर दृढ ले, फिर निष्फल हर तंत्र हो |

बन्ध से मुक्त भाव हर, निर्माण को स्वतंत्र हो ||

लय ढूंढ ले इसी में सब, प्रकृति साज बज रहा |

उन्मुक्त कंठ कलरव कर, खग चहक कह रहा ||

पवन का प्रसार हो, या फिर विपथगा की धार हो,

है प्रकृति प्रदत्त स्वतंत्रता, फिर तूँ क्यों परतंत्र हो |

बन्ध से मुक्त भाव हर, निर्माण को स्वतंत्र हो ||

उठती लहर सिन्धु देख ले, प्रकृति रूप हरेक ले |

नियम नियति की पालना, बस ये शपथ एक ले ||

हैं रचे अनेक फंद बंध के, प्रशस्त राह तेरी रोकने,

बुद्धि, भाव, कर्म, श्रम से, निर्माण मूलमंत्र हो |

बन्ध से मुक्त भाव हर, निर्माण को स्वतंत्र हो ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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