Glani:ग्लानि

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विषम रंग रंगी हुई, आज देश देह है |

संकीर्ण सोच हो रही, सिमट रहा स्नेह है ||

नैननैन नीर है, हृदयह्रदय में पीर है |

क्षुब्ध कोटिकोटि जन, पाँव में जंजीर है ||

साँससाँस घुट रही, योग्यता है लुट रही |

अपाहिजों की भीड़ से, श्रेष्ठता है पिट रही ||

कालिमा की कोख में, होती नवल भोर है |

अयोग्य चीर द्रोपदी, खींचते चहुँ ओर हैं |

अनेकानेक उलझने, विपद मेघ सिर घने |

राहें रोक हैं खड़ी, कदमकदम पे अडचने ||

मौन हैं अधर मगर, उर अनल उबल रही |

लीलने को तन्त्र को, लुप्त लौ है जल रही ||

नोचते हैं देश जो, आज देश के वे लाल हैं |

कोडियों के मोल, वीर सैनिकों के भाल हैं ||

मत मिले,अहित भले, ये सोच एक शेष है |

हज़ार हाथ लूट लो, ये सत्ता का परिवेश है ||

सत्य पीठ दे खड़ी, पत्रकारिता पथभ्रष्ट है |

हित स्वयं है साधती, सकल मूल्य नष्ट हैं ||

जाति,वर्ग,धर्म दंश, व्याप्त भय गलीगली |

डरीडरी शाख हर, सहमीसहमी हर कली ||

मगर न्याय एक लौ, जब तलक जल रही |

    लता लोकतंत्र यह, तब तलक है फल रही ||

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उम्मेद देवल

Shringar:श्रृंगार

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अचूक

मोद भरी सिणगार सजे, पिव कारण कामण तो सुकुमारी |

शोभित हास अलौकिल होंठन, राजत नैनन केसर क्यारी ||

कानन कुंडल हार हिया पर, चीर छटा अति रूप निखारी |

बोल पड़ी तब पाँवन पायल, मार अचूक है आज तिहारी ||

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उम्मेद देवल

Chitchor:चितचोर

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चितचोर

नैन भरे अनुराग सँवारत, कंचन देह सुकोमल गौरी |

राजत भूषण अंग मनोहर, मोहक अम्बर है पहिरो री ||

मादक हास हियो हुलसावत, चैन चुरावत सूरत भोरी |

गूंथत है सँग कुंतल के, चित साजन को ललना बरजोरी ||

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उम्मेद देवल

Kaamini:कामिनी

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kaamini

मादक गात मनोहर आनन, बंकिम लंक लगे हद प्यारी |

पूनम चंद छटा अंग राजत, कुंतल सावन की घट भारी ||

लोचन बाण अचूक चलावत, लागत सीधे आय हिया री |

डोलत आसन से मन साधक,चंचल है चित वृत्ति हमारी ||

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उम्मेद देवल

Pashemaan: पशेमां

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बेवफ़ा

तमन्नायें, आगोशगम में सुलाये हैं ||

करके एतबार, मंजर बर्बादी का लाये हैं |

रोशन रहे हरदम, ये दिल याद से तेरी |

इसलिए हम बैठे, दिल अपना जलाये हैं ||

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उम्मेद देवल

Atript:अतृप्त

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अतृप्त प्यास जिंदगी, क्षुधा सतत जिंदगी |

पड़ाव राह एक ना, है ये अनवरत जिंदगी ||

हाँफते हैं नापते, हम नित्य वो ही रास्ते |

विविध रूप तृष्णा, सिर्फ उसी के वास्ते ||

अजान लक्ष्य की तरफ, दौड़ है लगी हुई |

चैन नैन रंच ना, है व्यर्थ व्यस्त जिंदगी ||

छाँह में भी धूप है, हृदयहृदय में भूख है |

लूट है हर तरफ, जिह्वाजिह्वा झूँठ है ||

भर रहे हैं मुट्ठियाँ, अथाह रेत समुद्र से |

वैभव अपार हों, पर चाह अनंत जिंदगी ||

कदमकदम खार हैं, घुला गरल प्यार है |

हरेक शांत वक्ष मध्य, छुपे हुए गुबार हैं ||

बदल जाये कब कोई, ज्ञात पल का नहीं |

खुली किताब सी नहीं, बंद ख़त जिंदगी ||

श्वासश्वास टीस और, पोरपोर पीर है |

जिसे देखिये यहाँ, वही बहुत अधीर है ||

भरने बांह आसमां, लोग सब लगे हुये |

आदि से अनंत तक, एक चाहत जिंदगी ||

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उम्मेद देवल

Antas Peer : अंतस पीर

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जग के पासे शकुनी से, हर इक बाज़ी हारी है |

पल पल कंधा सपनों को, देने की लाचारी है ||

संघर्षों के समरांगन में, मेरी तो हर रात ढली,

जीवन क्या है ज्ञात नहीं, केवल उम्र गुजारी है ||

सुख मुक्ता की चाहत, है खींच मुझे ले जाती,

अश्रू सागर में हर दिन, गोतों की तैय्यारी है ||

मजबूरी पर हंसने वालो, जान जरा इतना लेना,

निश्चित मेरे बाद तुम्हारी, आने वाली बारी है ||

जीने की इस आलम में, कोई हसरत शेष नहीं,

मर भी नहीं सकते हैं, सर पर ढेरों उधारी है ||

कहने की आज़ादी है, उनको जिनकी चलती है,

झूंठों की पौ बारह है, सच के कंठ कटारी है ||

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उम्मेद देवल