Khilwad: खिलवाड़

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वन काट सपाट किये गिरि को, जल मारग पाट दिया कचरा |

खिलवाड़ किया सँग कुदरत के, विष नीर समीर अपार भरा ||

अनजान  बने  दृग  मूँद  रहे , विपदा  घन  रोज  रहे  गहरा |

जग संकट डूब, अकाल सहे , कर खीझ रहे बरसे बदरा ||

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उम्मेद देवल

Sach:सच

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2016-11-22_uproar54

 

खुद हाथ डुबोय दई लुटिया, बिखरी गरिमा तिनका तिनका |

जब आपहि कारज हीन करे, इसमें फिर दोष भला किनका ||

मुख आदर लानत पीठ मिले, सच जान गई जनता जिनका |

अब मंच रु पंचन साख नहीं , रह केवल नाम गया इनका ||

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उम्मेद देवल

Kab-Tak:कब -तक

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कब तक

नापाक दिखाता आँख इधर है, चीन उधर ललकारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

जग विख्यात पराक्रम जिनका, खौफ नाम से खाते |

उनको विवश किया है इतना, अदने मार तमाचे जाते ||

है आग सुलगती हर सीने में, नयनों में नीर के धारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

हथियार दिए पर हाथ नहीं, है यही विडम्बना भारी |

कैसे ऐसे हो सकती है, सीमा पर व घर में पहरेदारी ||

वरना किस की हिम्मत है, जो सैनिक शीश उतारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

छाती करते माँ की घायल, हम देखें विवश हैं जाते |

करते वार बेखौफ बहुतेरे, जब भी उनके जी में आते |

भय को त्याग, भरोसा धारो, हैं बाजू बलिष्ठ हमारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

हाथ खोल दो और नहीं कुछ, इतना बस हम चाहते |

आँख दिखना होता है क्या, सब उनको हम बतलाते||

कापेंगें ये कायर सपनों में , करके शौर्य याद हमारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

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उम्मेद देवल

 

Glani:ग्लानि

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विषम रंग रंगी हुई, आज देश देह है |

संकीर्ण सोच हो रही, सिमट रहा स्नेह है ||

नैननैन नीर है, हृदयह्रदय में पीर है |

क्षुब्ध कोटिकोटि जन, पाँव में जंजीर है ||

साँससाँस घुट रही, योग्यता है लुट रही |

अपाहिजों की भीड़ से, श्रेष्ठता है पिट रही ||

कालिमा की कोख में, होती नवल भोर है |

अयोग्य चीर द्रोपदी, खींचते चहुँ ओर हैं |

अनेकानेक उलझने, विपद मेघ सिर घने |

राहें रोक हैं खड़ी, कदमकदम पे अडचने ||

मौन हैं अधर मगर, उर अनल उबल रही |

लीलने को तन्त्र को, लुप्त लौ है जल रही ||

नोचते हैं देश जो, आज देश के वे लाल हैं |

कोडियों के मोल, वीर सैनिकों के भाल हैं ||

मत मिले,अहित भले, ये सोच एक शेष है |

हज़ार हाथ लूट लो, ये सत्ता का परिवेश है ||

सत्य पीठ दे खड़ी, पत्रकारिता पथभ्रष्ट है |

हित स्वयं है साधती, सकल मूल्य नष्ट हैं ||

जाति,वर्ग,धर्म दंश, व्याप्त भय गलीगली |

डरीडरी शाख हर, सहमीसहमी हर कली ||

मगर न्याय एक लौ, जब तलक जल रही |

    लता लोकतंत्र यह, तब तलक है फल रही ||

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उम्मेद देवल

Shringar:श्रृंगार

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अचूक

मोद भरी सिणगार सजे, पिव कारण कामण तो सुकुमारी |

शोभित हास अलौकिल होंठन, राजत नैनन केसर क्यारी ||

कानन कुंडल हार हिया पर, चीर छटा अति रूप निखारी |

बोल पड़ी तब पाँवन पायल, मार अचूक है आज तिहारी ||

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उम्मेद देवल

Chitchor:चितचोर

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चितचोर

नैन भरे अनुराग सँवारत, कंचन देह सुकोमल गौरी |

राजत भूषण अंग मनोहर, मोहक अम्बर है पहिरो री ||

मादक हास हियो हुलसावत, चैन चुरावत सूरत भोरी |

गूंथत है सँग कुंतल के, चित साजन को ललना बरजोरी ||

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उम्मेद देवल

Kaamini:कामिनी

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kaamini

मादक गात मनोहर आनन, बंकिम लंक लगे हद प्यारी |

पूनम चंद छटा अंग राजत, कुंतल सावन की घट भारी ||

लोचन बाण अचूक चलावत, लागत सीधे आय हिया री |

डोलत आसन से मन साधक,चंचल है चित वृत्ति हमारी ||

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उम्मेद देवल