नमन अटल

कब ज्योति होती क्षीण सूर्य की,
हाँ, दीपक अवश्य बुझा करते।
जिनका वास अनंत अंतस में,
जग में वो नाम कहाँ मरते??
जग विदित देह की नश्वरता,
तय होती काल की सीमा है।
पर पन्ने सत्कर्मों की पुस्तक के,
कभी काल से नहीं बिखरते।।
मन, वचन, कर्म से योग लिया,
जिसने सेवा और अभ्युदय का।
वो योगी काल के मस्तक पर हैं,
हर युग में अमिट चरण धरते।।
निस्वार्थ कर्म हो ध्येय, मंत्र भी,
सेवा सुमिरन, परहित पूजा हो।
वो पुण्य प्रसून इस वसुधा पर,
नरता सौरभ हित सदा महकते।।

————-उम्मेद देवल

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Khelat Faag:खेलत फाग

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होली है

चंग की थाप मृदंग मनोहर, बाँसुरिया धुन है मतवारी |

खेलत फाग सखा मिलिहीं सब, झूमत रंग गुलाल लगा री ||

नाचत मस्त धमाल मचावत, गावत सो मन आवत वांरी |

भेद नहीं बड छोटन के बिच, रंकन कोऊ न राव यहाँ री ||

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उम्मेद देवल

 

 

Shiv-Vandan:शिव वंदन

शिव

राजत भाल मयंक मनोहर, सर्पन माल गले अति प्यारी।

धार बहे नित गंग जटा बिच, लोचन तीन ललाट मखारी।।

शैल सुता अँग वाम विराजत, गोद गजानन मंगलकारी।

छोड़ सभी छल छंदन को मन, नाम सदा शिव है शुभकारी।

                                                     ———उम्मेद देवल

 

Namah Shivay :नमः शिवाय

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शिव

राजत भाल मयंक मनोहर, सर्पन माल गले अति प्यारी।

धार बहे नित गंग जटा बिच, लोचन तीन ललाट मखारी।।

शैल सुता अँग वाम विराजत, गोद गजानन मंगलकारी।

छोड़ सभी छल छंदन को मन, नाम सदा शिव है शुभकारी।।

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उम्मेद देवल

 

 

Khilwad: खिलवाड़

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वन काट सपाट किये गिरि को, जल मारग पाट दिया कचरा |

खिलवाड़ किया सँग कुदरत के, विष नीर समीर अपार भरा ||

अनजान  बने  दृग  मूँद  रहे , विपदा  घन  रोज  रहे  गहरा |

जग संकट डूब, अकाल सहे , कर खीझ रहे बरसे बदरा ||

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उम्मेद देवल

Sach:सच

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2016-11-22_uproar54

 

खुद हाथ डुबोय दई लुटिया, बिखरी गरिमा तिनका तिनका |

जब आपहि कारज हीन करे, इसमें फिर दोष भला किनका ||

मुख आदर लानत पीठ मिले, सच जान गई जनता जिनका |

अब मंच रु पंचन साख नहीं , रह केवल नाम गया इनका ||

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उम्मेद देवल