कब ज्योति होती क्षीण सूर्य की,
हाँ, दीपक अवश्य बुझा करते।
जिनका वास अनंत अंतस में,
जग में वो नाम कहाँ मरते??
जग विदित देह की नश्वरता,
तय होती काल की सीमा है।
पर पन्ने सत्कर्मों की पुस्तक के,
कभी काल से नहीं बिखरते।।
मन, वचन, कर्म से योग लिया,
जिसने सेवा और अभ्युदय का।
वो योगी काल के मस्तक पर हैं,
हर युग में अमिट चरण धरते।।
निस्वार्थ कर्म हो ध्येय, मंत्र भी,
सेवा सुमिरन, परहित पूजा हो।
वो पुण्य प्रसून इस वसुधा पर,
नरता सौरभ हित सदा महकते।।

————-उम्मेद देवल

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