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Drought_4C--621x414

वन काट सपाट किये गिरि को, जल मारग पाट दिया कचरा |

खिलवाड़ किया सँग कुदरत के, विष नीर समीर अपार भरा ||

अनजान  बने  दृग  मूँद  रहे , विपदा  घन  रोज  रहे  गहरा |

जग संकट डूब, अकाल सहे , कर खीझ रहे बरसे बदरा ||

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उम्मेद देवल