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कब तक

नापाक दिखाता आँख इधर है, चीन उधर ललकारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

जग विख्यात पराक्रम जिनका, खौफ नाम से खाते |

उनको विवश किया है इतना, अदने मार तमाचे जाते ||

है आग सुलगती हर सीने में, नयनों में नीर के धारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

हथियार दिए पर हाथ नहीं, है यही विडम्बना भारी |

कैसे ऐसे हो सकती है, सीमा पर व घर में पहरेदारी ||

वरना किस की हिम्मत है, जो सैनिक शीश उतारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

छाती करते माँ की घायल, हम देखें विवश हैं जाते |

करते वार बेखौफ बहुतेरे, जब भी उनके जी में आते |

भय को त्याग, भरोसा धारो, हैं बाजू बलिष्ठ हमारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

हाथ खोल दो और नहीं कुछ, इतना बस हम चाहते |

आँख दिखना होता है क्या, सब उनको हम बतलाते||

कापेंगें ये कायर सपनों में , करके शौर्य याद हमारे |

जन जिह्वा आक्रोश उबलता, चुप सत्ता के गलियारे ||

photo

उम्मेद देवल

 

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