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विषम रंग रंगी हुई, आज देश देह है |

संकीर्ण सोच हो रही, सिमट रहा स्नेह है ||

नैननैन नीर है, हृदयह्रदय में पीर है |

क्षुब्ध कोटिकोटि जन, पाँव में जंजीर है ||

साँससाँस घुट रही, योग्यता है लुट रही |

अपाहिजों की भीड़ से, श्रेष्ठता है पिट रही ||

कालिमा की कोख में, होती नवल भोर है |

अयोग्य चीर द्रोपदी, खींचते चहुँ ओर हैं |

अनेकानेक उलझने, विपद मेघ सिर घने |

राहें रोक हैं खड़ी, कदमकदम पे अडचने ||

मौन हैं अधर मगर, उर अनल उबल रही |

लीलने को तन्त्र को, लुप्त लौ है जल रही ||

नोचते हैं देश जो, आज देश के वे लाल हैं |

कोडियों के मोल, वीर सैनिकों के भाल हैं ||

मत मिले,अहित भले, ये सोच एक शेष है |

हज़ार हाथ लूट लो, ये सत्ता का परिवेश है ||

सत्य पीठ दे खड़ी, पत्रकारिता पथभ्रष्ट है |

हित स्वयं है साधती, सकल मूल्य नष्ट हैं ||

जाति,वर्ग,धर्म दंश, व्याप्त भय गलीगली |

डरीडरी शाख हर, सहमीसहमी हर कली ||

मगर न्याय एक लौ, जब तलक जल रही |

    लता लोकतंत्र यह, तब तलक है फल रही ||

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उम्मेद देवल

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