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जग के पासे शकुनी से, हर इक बाज़ी हारी है |

पल पल कंधा सपनों को, देने की लाचारी है ||

संघर्षों के समरांगन में, मेरी तो हर रात ढली,

जीवन क्या है ज्ञात नहीं, केवल उम्र गुजारी है ||

सुख मुक्ता की चाहत, है खींच मुझे ले जाती,

अश्रू सागर में हर दिन, गोतों की तैय्यारी है ||

मजबूरी पर हंसने वालो, जान जरा इतना लेना,

निश्चित मेरे बाद तुम्हारी, आने वाली बारी है ||

जीने की इस आलम में, कोई हसरत शेष नहीं,

मर भी नहीं सकते हैं, सर पर ढेरों उधारी है ||

कहने की आज़ादी है, उनको जिनकी चलती है,

झूंठों की पौ बारह है, सच के कंठ कटारी है ||

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उम्मेद देवल

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