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रवाँ लहू के साथ अब, नुक्ताचीं की आदतें |

माहिर हर शख्स हुआ, करने में शिकायतें ||

मसले से पहले कीजिये, गैरों को दरकिनार |

खडी है कितनी देखिये, अपनों की अदावतें ||  

बुढापे से पहले ही जो, देती हैं झुका कमर |

जीने न देती सुकून से, समाजों की रवायतें ||

खिले हैं पुर शान से, ये गुल खारों के बीच में |

मिलती है हर एक को, कुदरत की नियामतें ||    

नाज़ो  सितम उठाइए, आशिक़ी काफ़ी नहीं |

होती कहाँ इस हुस्न की, हुज़ूर यूँ ही इनायतें  ||

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उम्मेद देवल

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