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29_03_2013-29mar13hatk

आगोश-ए- फलक से तो, फकत बरसात हुई है |

बुलंदियाँ तो धरती की कोख से, तामीरात हुई हैं ||

परस्तिश इल्म की जब भी, यहाँ इंसान ने की है |

सनद है तारीखें सारी, तब-तब करामात हुई है ||

होती कहाँ कुछ कहने को, दरकार लफ़्ज़ों की |

देखा है नज़रों की नज़रों से, अक्सर बात हुई है ||

दूरियाँ अब तलक कायम, जो तकसीम दर्जों से |

मशरिक की कब मगरिब से, मुलाक़ात हुई है ||

ज़ाबिता-ए-मुल्क उसूलन, हैं जब दोगले चलते |

घुला है ज़हर फिज़ाओं में, बदतर हयात हुई है ||

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उम्मेद देवल

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