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romance

हरेक वादा मुस्कुरा के, मासूमियत से छल गया |

निज़ाम मेरे मुल्क का, ये राह किस पे चल गया ||

कल तक था जो मेरी, सरपरस्ती का तलबगार |

आज वो मुर्शिद बना, वक़्त कितना बदल गया ||

जलते हैं पाँव छाँव में, हम तलाशे कहाँ सुकून |

लगता है जिगर धरती का, अपनों से जल गया ||

फितरत है मौसमों की, कुछ ताज्जुब नहीं होता |

हैरां हूँ देख के उसे, वो आगे इनसे निकल गया ||

सब दे रहे थे नसीहतें, खड़े साहिल पे तमाशाई |

हौसला तो उसका था, जो तूफां में संभल गया ||

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उम्मेद देवल

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