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सरकी चुनरी, बिखरी अलकें, बन जोगन भेष गया सगरा |

सिणगार बने सब सौतन से, अखियाँ न सुहावत है कजरा ||

सगरी बिसरी सुधियाँ तन की, पल चैन न पावत है जियरा |

पिव आज बिना इन नैनन से , बिन सावन है बरसे बदरा ||

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उम्मेद देवल

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