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349_the-way-we-were_jackie

अब न रही वो रौनक रंगत, हाला,मधुशाला, रात नहीं |

देती जाम है फ़र्ज़ निभाने, अब साकी में वो बात नहीं ||

आते हैं सावन अब भी लेकिन,आँखों में आंसू देने को |

जो सैलाब उठा दे सूने दिल में, होती वो बरसात नहीं ||

दिल बहलाते हैं याद उन्हें कर, जो लम्हे थे जागीर रहे |

अब आकर जाते ख़्वाबों से भी, होती जी भर बात नहीं ||

दुनिया की ही बात करोगे, तुम दुनिया वाले जो ठहरे |

सच तो लेकिन इतना भर है, दिल की कोई जात नहीं ||

सब कुछ लूट गए हो लेकिन, फिर भी तुमसे कहते हैं |

लाख करो ले जा न सकोगे, तुम यादों की सौगात नहीं ||

ये चाहत का दीवानापन, कब मर कर भी है मिट पाता |

जो साँसों के संग ही मर जायें, वो तो फिर जज्बात नहीं ||

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उम्मेद देवल

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