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लजियात रही वृषभानु लली ,
अरु मुस्कावत मोहन हैं मधुरे |
हुलसी विकसी उर की कलियाँ,
इक ध्यान न दूसरा चित्त धरे ||
अवलोकत आनन प्रीत पगे ,
सब लोकन की सुधियाँ बिसरे|
छलके रस गागर राधिका लोचन,
नटनागर नैनन नेह झरे ||

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उम्मेद देवल

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