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ज़िंदगी चीज़ है क्या, क़ज़ा क्या है |

मत पूछिए कि,इश्क़ का मज़ा क्या है ||

तिरे दो अब्सार हैं सनम, दो जहाँ मेरे |

मैं नहीं जानता, इनके सिवा क्या है ||

ये इशरतज़र्ब, हुश्न की इनायत हैं |

पसोपेश में हूँ दर्द क्या है, दवा क्या है ||

शबओ’सहर ख्यालों में, गुफ्तगू तुझसे |

पूछता है हर कोई हमसे , हुआ क्या है ||

दिल तो अपना था, क्यूँ अपना न रहा |

या इलाही, ये दिलमुब्तला क्या है ||

रहता हर वक़्त ख्यालों में तसव्वुर तेरा |

ख़त्म होता नहीं, ये सिलसिला क्या है ||

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उम्मेद देवल

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