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अंदाज़-ए-हुश्न कभी कामिल नहीं होते |

शोखियों में जो ये ज़लवे शामिल नहीं होते ||

गर आलमे दीवानगी इश्क़ की नहीं होती,

हम मकतूल नहीं होते,वो क़ातिल नहीं होते ||

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उम्मेद देवल

 

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