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मौज़ों के इरादे कुछ करने के क़ाबिल नहीं होते |

हसरतों में जो मिटने के ज़ज्बे शामिल नहीं होते ||

कशिश-ए-इश्क़ है मानिए, वरना होते न बेकरार ,

मचलते ना समन्दर कभी, जो ये साहिल नहीं होते ||

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उम्मेद देवल

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