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मैं कवि नहीं हूँ, केवल अपने, उर भावों को लिखता हूँ |

महसूस किया है  जिनको मैंने, उन भावों को लिखता हूँ ||

पांडित्य नहीं है छंदों का, और शब्दों का लालित्य नहीं |

लिख देता हूँ उर  अवगाहन , रचना धर्म भी नित्य नहीं ||

अलग हो रहे हैं हम जिनसे, उन दायित्वों को लिखता हूँ  |

महसूस किया है  जिनको मैंने, उन भावों को लिखता हूँ ||

लिखता हूँ मैं दर्द मनुज का, और पीर पराई लिखता हूँ |

जो वृद्ध हुई हैआने से पहले, मैं वो तरुणाई लिखता हूँ ||

निज कर से निर्मित नर की, रिश्तों की खाई लिखता हूँ |

जीवन की आपा-धापी में, नित घटती कमाई लिखता हूँ |

लिखता हूँ मरता बचपन, मानव स्वभावों को लिखता हूँ |

महसूस किया है  जिनको मैंने, उन भावों को लिखता हूँ ||

ललना का श्रृंगार भी लिखता, उनकी निठुराई लिखता हूँ |

लिखता हूँ मजदूरिन को, और उसकी रुसवाई लिखता हूँ ||

पलकों के पट भीतर जो सपने,उनकी अंगड़ाई लिखता हूँ |

यौवन नहीं शाश्वत रहता, मैं वय की सच्चाई लिखता हूँ ||

घटित लाज़मी जिनका होना, उन प्रभावों को लिखता हूँ |

महसूस किया है  जिनको मैंने, उन भावों को लिखता हूँ ||

लिखता मैली होती सरिता, कानन की कटाई लिखता हूँ |

मौन कंठ कोकिल को लिखता, उजड़ी अमराई लिखता हूँ ||

रिश्तों में बीज ज़हर का बोती, मैं वो धर्म दुहाई लिखता हूँ |

लुटते जन के अरमानों को, नेता की ठकुराई लिखता हूँ ||

ठगते रोज हमारी आशा, उन मिथ्या दावों को लिखता हूँ |

महसूस किया है  जिनको मैंने, उन भावों को लिखता हूँ ||

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उम्मेद देवल

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