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अपने हाथों ही अपनी, हसरतों का ख़ूँ करके |
मैं मुतमइन हूँ बहुत , तर्क-ए-आरज़ू करके ||
गुजरी है तन्हा ज़िन्दगी, यादों की रह-गुज़र |
भटके बेकरार हैं, चाहत की जुस्तजू करके ||
जीने का लुत्फ़ आ गया, अब न रंजो गम कोई |
देखा जो अपने आप को,खुद से रूबरू करके ||
आएगी उतर ज़न्नत यहीं, इन नज़रों के सामने |
देखो आज़मा बार इक, औरों को सुर्खरू करके ||
रखिए न कोई मिजाज़ में, तकल्लुफ़ की बंदिशें |
मिलिए जनाब हमसे पर, दिल को बा-वज़ू करके ||

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उम्मेद देवल

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