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जब मानव की बौद्धिक क्षमता का विकास हुआ , उन्होंने बसना प्रारम्भ किया उसी के साथ उन्हें सामजिक संगठन की आवश्यकता महसूस हुई ,जो उनके विकास एवं सुरक्षा के लिए अपरिहार्य थी |
कालांतर में ये सामजिक संगठन जो वर्ग थे,उन्होंने शनैःशनैः जाति का स्वरूप अख्तियार कर लिया, अब उनमें खुलेपन की जगह संकीर्णता का प्रसार होने लगा | संगठन कर्म आधारित ना होकर जन्म आधारित जाति बनने लगे |
और यहीं से अपनी श्रेष्ठता और प्रभुसत्ता दूसरों पर कायम करने का युग प्रारम्भ हुआ | निसंदेह बुद्धि का स्थान सर्वोपरी है-जहाँ शिक्षा है,वहाँ आलोक है | और शिक्षा से जुड़ा ब्राह्मण वर्ग समाज में सर्वोपरी स्थान पर आसीन हुआ | समग्र ज्ञान की थाती उनके हाथों में थी |
बुद्धि ने महसूस किया मैं सक्षम तो हूँ, लेकिन जब तक बल का सहयोग नहीं होगा ,मैं पूर्णतया सुरक्षित नहीं रह सकती, और बल के प्रतीक क्षत्रिय वर्ग को उसने संगठन में दूसरे पायदान पर स्थापित कर दिया | इस प्रकार बुद्धि और बल का मेल लगभग एक दुर्जेय स्थिति को पाने में सफल हुआ |
बुद्धि और बल दोनों को भौतिक जीवन हेतु धन चाहिए ,और धन को चाहिए सुरक्षा अतः वैश्य वर्ग को उन्होंने साथ लिया और यह वर्ग भी अपनी सुरक्षा मानकर जो स्थान मिला ,उस पर सहर्ष उनके साथ हो लिया |
इन तीनों वर्गों के मेल को शासन और शोषण करने के लिए कामगरों के वर्ग की आवश्यकता थी, क्योंकि इन्हें साथ रखने से शासन और शोषण की सम्भावना ही समाप्त हो जाती, इसलिए उन्हें अछूत रखा गया, जिन्हें बाद में दलित भी कहा गया है | इस वर्ग के पास श्रम की अपार क्षमता थी | जिसकी इस मेल को सख्त आवश्यकता थी |
बुद्धि ने इन्हें शिक्षा से दूर रखा, बल ने भय उत्पन्न किया और धन ने आर्थिक हरण किया, इस प्रकार उन्होंने इनकी आर्थिक एवं सामजिक स्थिति को उस स्तर पर पहुंचा दिया जहां इनकी सोच शून्य को प्राप्त हो गई |
अब हल्का सा ध्यान परिश्रम और पौरुष पर आकृष्ट कर चलें-परिश्रम शारीरिक शक्ति का द्योतक है और पौरुष आत्माभिमान का | जिसकी विवेचना हम आवश्यकतानुसार आगे करेंगे |
अब सीधे आरक्षण का बिंदु :- स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान सहृदय जनों को इस वर्ग की दुर्दशा खली और उन्होंने इनके उत्थान के लिए बहु आयामी कार्य किये, जिनसे इस वर्ग में शिक्षा का प्रसार हुआ परिणामस्वरूप एक नई चेतना का उदय हुआ | इस वर्ग को अपने अस्तित्व का, अपने पौरुष का भान हुआ |
स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात संविधान में इनके उत्थान के लिए दस वर्षीय आरक्षण का प्रावधान किया गया (ऐसा संविधान में वर्णित है ), जबकि वह इन्हें इसलिए दिया गया था कि तात्कालिक परिस्थितियों में इस वर्ग के पौरुष को नज़रअंदाज करना कतई संभव नहीं था, क्योंकि इस समय यह वर्ग नई चेतना और आत्माभिमान से ओत-प्रोत था,और मुख्य धारा में इनको साथ रखना उस समय की परिस्थितियों की मांग थी,इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था,प्रतिकूल परिणाम का भय था |
शासक वर्ग कदापि नहीं चाहता कि सब समकक्ष हो, अगर ऐसा होगा तो फिर शासन किस पर होगा ,उन्हें पिछड़े तबके की हमेशा दरकार रहती है |
यही कार्य हमारी शासन व्यवस्था कर रही है, इस वर्ग के पौरुष को मृतप्राय करने के लिए इसे दस वर्षीय लोलीपॉप चुसा रही है और अनजान बना यह वर्ग बड़ी शान और आराम से इसे चूस रहा है, वह इस बात से नावाफिक है कि इस आड़ में सरकार उन्हें अकर्मण्य बनाकर उनके पौरुष को प्रतिपल क्षीण कर रही है | यह परिस्थिति भावी में अनिष्टकर एवं दुर्भाग्य में परिणिति की सूचक है |
इस वर्ग की सेवा को छोड़कर सेना, आर्थिक और अन्य क्षेत्रों में उपस्थिति के आंकड़ों का आप स्वयं आकलन कर निर्णय के लिए स्वतंत्र है | इस वर्ग ने पहले भी सेवा की और अब भी सेवाश्रित बनाया जा रहा है ,यह एक विडम्बना है |
अगर सच में इस वर्ग को समाज में समता हासिल करनी है, तो वह यह अपने पौरुष से इसे प्राप्त कर सकता है,किसी की दया पर आश्रित होकर नहीं | इसे मुख्य धारा में चलने के लिए सभी क्षेत्रों में अपना पुरुषार्थ साबित करना होगा, और अपने आत्माभिमान को जिन्दा रखना होगा,और यह तभी संभव होगा जब यह वर्ग आरक्षण के इस मीठे ज़हर की खुराक को एक दुर्व्यसन की तरह त्याग देगा | अन्यथा परिणाम दिखाई बेशक ना दे पर तय अवश्य है |

 

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उम्मेद देवल

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