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           तपती धूप सी ज़िन्दगी, तलाश छाँव कर रही |

          नज़रों  के सामने ही , हसरतें हज़ार मर रही ||

          गए न आये वो पलट, हमारी भी वो ही रहगुज़र |

         आपा-धापी और न कुछ, उम्र यूँ ही गुज़र रही ||

         संवरने की चाह में, बहुत रखते हैं साफ़ आईना |

         दिल के दर्पण पे मगर, देखो रोज गर्द चढ़ रही ||

         एतबार न किसी का है, हम खुद जो बेयकीन हैं |

        हरेक आहट पर तभी तो, ये धड़कने  है डर रही ||

        बस्ती में रहते हम मगर, इंसान कोई बसता नहीं |

       इस गहमागहमी बीच में, है खामोशी पसर रही ||

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उम्मेद देवल

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