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ग़ुबार

खता न थी तेरी कोई, ये दिल ही गुनहगार था |

वो तेरी थी शोखियाँ, समझे हम कि प्यार था ||

है सज़ा किसी ये जन्म की, ऐसा अब हमें लगे |

अश्कों से तुमने चुक लिया, क़र्ज़ कोई उधार था ||

सब महफ़िलें उजड़ गई, अब हर तरफ़ विरानगी |

राह-ए-दिल गुज़र गया, वो इश्क़ का ग़ुबार था ||

अब पशेमाँ होना क्यों, ऐतबार हमने खुद किया |

लूट वो ही ले गया, जो अज़ीज हमारा यार था ||

मायूसियाँ,रंजो गम,तन्हाईयाँ, अब वहाँ आबाद हैं |

वो रो रहा नसीब पे, जो खिला-खिला दयार था ||

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उम्मेद देवल

 

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