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menjadi_pribadi_merdeka

आप धापी आंच में, जल गई सुनहरी ज़िन्दगी |

बन के रह गई  राख की, एक  गठरी ज़िन्दगी ||

सुबह की न तो ताजगी, न रौनकें हैं शाम की |

अब तो बन के रह गई, तपती दोपहरी ज़िन्दगी ||

पाने की हसरतें लिए, लोग बेहताशा रफ़्तार से |

दौड़ रहे हैं सब मगर, है सच में ठहरी ज़िन्दगी ||  

वाकया हो कुछ मगर, अपने में सब खोये हुये |

सुनती न सदा पड़ोस की, अब बहरी ज़िन्दगी ||

काटती इक दूसरे को, मिलती पर मिलती नहीं |

बन गई रास्तों के जाल सी, ये शहरी ज़िन्दगी ||

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उम्मेद देवल

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