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इज़हार

देखे हैं मुन्तजिर हमने तो, उनको रहमतों के |

जो सर-ए-रहगुज़र हैं, ज़माने में मोहब्बतों के ||

अब तो दिल को दर्द की, है आदत सी हो गई |
गुजरें हैं मेरी नज़रों से कई, ज़नाजे हसरतों के ||

न अय्याशी की आरज़ू, न खजानों के खवाब हैं |

मिल जाये मुझको बस, कुछ लम्हें फुर्सतों के ||

हमने तो बोये बीज थे, इस ज़माने में प्यार के |

पर न जाने आये कैसे उग, दरख़्त नफरतों के ||

सीधे नज़र आते रास्ते, जाते हैं आगे मुड़ मगर |

लगता है ये उभरे अक्स हैं, इंसानी फितरतों के ||

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उम्मेद देवल

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