Tags

, , , , , ,

117726214

थी तोप मुकाबिल कलम कभी, अब बल घुटनों के  घिसती है |

बस दीदार करा दो नोटों का, फिर जो लिखवा लो, लिखती है ||

खुद्दारी मरी,खुदगर्ज़ बनी, ये न लिखते झूँठ पुलिंदे थकती है |

दौलत की खनक बस सुन जाये, फिर बिन घुँघरू के नचती है ||

रहा न अब मतलब मज़लूमों से, उनकी हालत पर तो हँसती है |

जो अन्याय विरुद्ध थी शस्त्र कभी, खुद अब शोषण करती है ||

भ्रष्ट हुई, बेईमान बनी, इसमें न अब लौ ईमान की जलती है |

कर लो क्रय धन से कोई भी , अब बाज़ार सरे यह बिकती है ||

आँखों में इसके चकाचौंध , नहीं दुनिया अँधियारी दिखती है |

दासी क्रीत बनी सत्ता की, नित ही स्वाद सुखों का चखती है ||

कलम लगा मत कालिख निज मुख, रख अपनी मर्यादा को |

बस धर्म तेरा तो सच लिखना, और जीना है जीवन सादा को ||

photo

उम्मेद देवल

Advertisements