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लो कर लाख जतन डूबेगी, सागर पार नहीं होती ||
कागज़ की कश्ती में, छेदों की दरकार नहीं होती ||
लगते ही लोग जहाँ डाली से, तोड़ गुलों को लेते हैं |
बेफिक्र बागबां बगिया का, वो गुलज़ार नहीं होती ||
दिल की जुबां तो आँखे हैं, हर हाल बयां कर देती है |
ये जो दिल की चाहत है, शब्दों में इज़हार नहीं होती ||
मार तपिश की धरती का, हर ज़र्रा बंजर कर जाती |
अगर रिमझिम सावन की, ये जो बौछार नहीं होती ||
जाने कैसे लोग यहाँ तो, कर लेते हैं बातें मनभाती |
हमसे तो कभी किसी की, झूँठी मनुहार नहीं होती ||

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उम्मेद देवल

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