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stormatsea

 

चहुँ ओर से जोर प्रभंजन का, संग दामिनी दमक कराल महा |
घन नाद भयंकर भय भरती, सागर कर अति तांडव रास रहा ||
उठती लहरें नभ लेने लपेट, है उदधि उर कोप का ज्वार प्रबल |
है खामोश दिशायें दशों खड़ी, नीड़ों में दुबकते खग व्याकुल ||
तम अंक धरा सिमटी बैठी , बिन तड़ित आलोक लवलेश नहीं |
आशंका,भय व्याप्त ओर चहुँ, कहीं सुखद नजर परिवेश नहीं ||
यह प्रचण्ड चुनौती सागर की, थी नर साहस को ललकार रही |
लहरें क्रोधित सागर की, थी विषमय नागिन सी फुत्कार रही ||
तभी एक दृढ निश्चयी नाविक ने, निज पैर बढ़ा पतवार उठाई |
घोष किया”नर हूँ मैं,न डरूंगा मैं”, कैसी भी घड़ी हो सिर आई ||
तभी इक चमत्कार सा घटित हुआ, वह वेग प्रभंजन ठहर गया |
सहसा नभ से घन छँटने लगे, वह ज्वार जलधि का उतर गया ||
और धरा फैलती रवि रश्मियाँ, जाती थी यही इक सन्देश दिये |
जो साहस,पौरुष रखते है, सच में इस वसुधा पर तो वही जिये ||

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उम्मेद देवल

 

 

 

 

 

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