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स्वार्थ गठबंधन में आत्मीयता, मात्र दिखावा होती है |
प्रेम-प्रदर्शन, हँसी चेहरों की, महज छलावा होती है ||
ख़ामोशी लब की मजबूरी, अभिव्यक्ति पर  पहरे होते |
अपनेपन का भाव प्रकट पर, भेद दिलों में गहरे होते ||
मन मैले पर चहरे खिले, मिलते मधुर मुस्कान लिये |
सत्य परस्पर जाने सब, जाते हैं मगर गुणगान किये ||
कार्य अनैतिक यद्यपि हो, सहने की विवशता होती है |
कर प्रतिकार नहीं सकते, घुट-घुट स्वतंत्रता रोती है ||
कुछ विलग धमकियाँ जब चाहे , जान लाचारी देते हैं |
आगत भय से जो आशंकित, वो विवश उन्हें सहते हैं ||
वे पशुतुल्य हैं ,मनुज नहीं , खुद्दारी जिनके खून नहीं |
और भले वो पा लें कुछ भी, पा सकते कभी सुकून नहीं ||

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उम्मेद देवल

 

 

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