Tags

, , , , ,

gitasaar

जाना जिसका जीवन है, यूँ तो जग में सब ही जीते हैं |
इस अमृत कलश से पर कितने, घूँट सुधा की पीते हैं ||
अपना नहीं पर अपना समझें, यही विडम्बना भारी है |
पल का पता नहीं किसी को, युग-युग की तैय्यारी है ||
परहित जीवन मर्म गौण है, निज हित की मारामारी है |
जान बने अनजान सभी, ये कैसी विवशता,लाचारी है ||
प्रतिपल यहाँ खोजते नर हैं, अपने ही महज सुभीते हैं |
इस अमृत कलश से पर कितने, घूँट सुधा की पीते हैं ||
साँसों की जीवन में हर क्षण, अदृश्य आँच दहकती है |
करती रहती दग्ध लगे पर, जीवन बगिया महकती है ||
भ्रमावरण से मेधा आच्छादित, जाती पाश जकड़ती है |
ये रिश्तों की निष्ठुर तरुणाई, वय के साथ बदलती है ||
अवसर पा मूल्य विहीन करें, जो पल उन हित बीते हैं |
इस अमृत कलश से पर कितने, घूँट सुधा की पीते हैं |
नश्वर को नश्वर चाह शाश्वत, हर ओर दिखाई देती है |
ये दुनिया शब्दों से उपकारों की, कर भरपाई देती है ||
अनवरत भौतिक संचय की, यहाँ होड़ दिखाई देती है |
पद, वैभव के पाँव तले, नरता की चीख सुनाई देती है ||
सायास भरें, सतत रहते भरते, पर घट रीते के रीते हैं |
इस अमृत कलश से पर कितने, घूँट सुधा की पीते हैं |

photo

उम्मेद देवल

Advertisements