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किसका करें यकीन अब, अपने ही छल गए |
दिल के सदाबहार भी, मौसम सा बदल गए ||
जिसने भी चाँद हुश्न को , कहा है सच कहा |
कभी पूरब तो, कभी पश्चिम में निकल गए ||
ये ज़ख्म दिल का हम हरा, रखेंगे हयात भर |
सब्ज़ा-वार यादें रहे, अरमां तो सारे जल गए ||
ठोकर पत्थर से नहीं, हमको तो गुल से लगी |
काश पहले जानते, होते हम भी सम्हल गए ||
कोशिश लाख करें पर , न पायेंगे उन्हें भुला |
सपने वो जो ख़यालों में, चुपके से पल गए ||

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उम्मेद देवल

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