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खुले ख़त सा जो रखा दिल, किसी ने नहीं पढ़ा |
ये दुनिया तो तलाशती, है बंद लिफाफों में क्या ||
कोशिश हमने हज़ार की, अब न धोखा खायेंगे |
दो बोल प्यार के कहे, हर कोई फिर से ठग गया ||
रुकेंगे सिलसिले यादों के, अब साँसों के संग ही |
दिल का रिश्ता साँस संग, है किसको नहीं पता ||
उड़ गए हैं परिंदे दूर बहुत, पर जो उनके आ गए |
जहाँ पले थे उस नीड़ की, अब चाहत उन्हें कहाँ ||
काट डाले दरख्त वो, बैठे थे जिनकी छाँह कभी |
सोचते हैं अब कि सूना हुआ, या है आँगन खुला ||

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उम्मेद देवल

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