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बैठा रहा बिछाये पलकें, पल छिन में बरसों बीते |

खोज रहा हूँ मैं वो सपने, जो मेरी आँखों से रीते ||

मन आँगन है पतझड़ मेरे, बिखरी पड़ी है आशायें |

पथ धूमिल ना दिखता कुछ, लू सी चुभे हताशायें ||

अब ना बहारें वो गुलशन, उजड़ गए सब मनचीते |

खोज रहा हूँ मैं वो सपने, जो मेरी आँखों से रीते ||

छल है वहीं विश्वास जहाँ, कर दिखलाया अपनों ने |

समझाई जीवन सच्चाई, मुझको इन टूटे सपनों ने ||

चिथड़े-चिथड़े जीवन आशा, हार गया हूँ सींते-सींते |

खोज रहा हूँ मैं वो सपने, जो मेरी आँखों से रीते ||

photo

उम्मेद देवल

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