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प्रारम्भ हर्ष का वहाँ , जहाँ अंत शोक है |

पार तम के झाँक ले, रश्मियों का लोक है ||

वसुधा अपार सम्पदा , कर्म के अधीन है |

विजयी हौसले सदा, जीतते जो प्रवीण है ||

जलधि जग अनंत में, बिंदु सा अस्तित्व है |

मगर बिंदु ही सिंधु का, जान मूल तत्व है ||

नैराश्य तिमिर आवरण, आशा ही आलोक है |

पार तम के झाँक ले, रश्मियों का लोक है ||

अनंत व्योम प्रसार से, लक्ष्य, राह है यहाँ |

दृढ निश्चय चुन मगर, पहुँचना तुझे कहाँ ||

पथ में अनेक अडचने, अनेक पाश, जाल हैं |

हैं अपार उलझनें, अनसुलझे कई सवाल हैं ||

हिम्मत अदम्य है अगर, तो न कोई रोक है |

पार तम के झाँक ले, रश्मियों का लोक है ||

दुर्लभ नर तन मिला, कर्ज़ सभी उतार चल |

स्वयं संग लोक जन, भाग्य को संवार चल ||

व्यर्थ काल है कहाँ, जो उन्माद में गुजार दें |

प्रयास सतत यही रहे, स्वर्ग धरा उतार दें |

काल प्रसार मध्य वय, सूचिका की नोक है |

पार तम के झाँक ले, रश्मियों का लोक है ||

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उम्मेद देवल

 

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