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हज़ारों हज़ार दायरे, खड़े जो हम हैं कर रहे |

फकत नाम जिंदगी, सिमट सिमट मर रहे ||

भाव के आलोक पर, संकोच तम- घन खड़े |

शब्द अधर की क़ैद में, रहते मौन हैं पड़े ||

अज्ञात भय व्याप्त उर, सांस सांस डर रहे |

फकत नाम जिंदगी, सिमट सिमट मर रहे ||

पहचान मनुज की कठिन, प्रतिक्षण हो रही |

बांटने की होड़ में, अस्तित्व नरता खो रही ||

नहीं रुके हैं अब तलक, खण्ड-खण्ड कर रहे |

फकत नाम जिंदगी, सिमट सिमट मर रहे ||

समग्र हित, स्वार्थ में, निहित होता जा रहा |

विस्मृत कर विराट भाव, गीत निज गा रहा ||

पाने की अभिलाषा में, सर्वस्व अपना हर रहे |

फकत नाम जिंदगी, सिमट सिमट मर रहे ||

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उम्मेद देवल

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