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ये नकाबों की दुनिया है , यहाँ चहरों पे चहरे हैं |

दिल में ज़ख्म गैरों से, अधिक अपनों के गहरे हैं ||

आखिर यही अंजाम तो, इन अश्कों का होना था |

गिरते न कब तलक वो , जो पलकों पे ठहरे हैं ||

बता दे किस बात पर तूँ, सागर मगरूर रहता है |

यहाँ तुझसे कहीं ज्यादा , दिलों के राज़ गहरे हैं ||

कहाँ रहते हैं खुले देखो , घरों के दिन में दरवाज़े |

अँधेरे खौफ के दिल में, और कहते दिन सुनहरे हैं ||

अब अस्मत,जान औ’ मान के, रहे न मायने कोई |

जहाँ न जरूरते जिनकी , लगे उन ज़गहों पहरे हैं |

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उम्मेद देवल

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