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मतलब परस्त हैं सारे, जो बिठाते दिल पे पहरे हैं |

कर रहे बातें ख़िलाफ़त की, वो ना अपने चेहरे हैं ||

मत दो हवाला कौम का , सोचो हमने क्या दिया |

कर्ज़ इस मिट्टी का बराबर, सर पर तेरे – मेरे है ||

आओ चलें हो जायें जुदा, जो दोनों की रज़ा ठहरी |

पर पहले उनको बाँट ले, जो हवा,रोशनी, अँधेरे हैं ||

लुटाते दिल के धारों को , क्या गंगा ने जात पूछी |

क्यूँ इसके किनारे मिलकर , अपने साझा बसेरे हैं ||

सरहद पर जाकर देख , कितना लहू मिलकर बहा |

शुक्र करो  उनके ही दम , ये अपने रोशन सवेरे हैं ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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