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कहने क्या अंदाज़ तेरे, गये इस तरहा से छोड़ के |

दूर खुद तो हो गये मगर, गम से रिश्ता जोड़ के ||

वो बन गया नासूर अब, ज़ख्म जो दिल पर दिया |

तुझसा नहीं ये बेवफा, ना जाएगा हरगिज़ छोड़ के ||

ना झेलता दुश्वारियाँ , यूँ ना सहता रंज औ’ गम |

बचपन जो होता हाथ मेरे , लेता पकड़ मैं दौड़ के ||

लो तन्हा फ़िर हम हो गये, इस हसीं जवां रात में |

ख्व़ाब सारे सो गये , चादर उदासियों की ओढ़ के ||

बदकिस्मती होती है क्या, ये पूछिए उस गुल से तुम |

रंग जिसके सब ले गई हो, खुद फिज़ा ही निचोड़ के ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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