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पसर रही विषमता , सिमट रहा प्यार है |

बह रही है देश मेरे , ये कौनसी बयार है ||

कहीं फ़साद कौम के, कहीं झगडे जात के |

हर तरफ निसान है, अपनों के उत्पात के ||

मुरझा रहे प्रेम पुष्प , पनपते हुए खार हैं |

बह रही है देश मेरे , ये कौनसी बयार है ||

अपने ही उजाड़ते , अपने घर को आज हैं |

खौफज़दा हर जगह , ना सुरक्षित लाज़ है ||

सहमी हुई हर नज़र , खड़े खौफ़ हज़ार हैं |

बह रही है देश मेरे , ये कौनसी बयार है ||

सुयोग्य योग्य ना रहे, हताश हैं निराश हैं |

प्रशस्त पथ में पड़े , पाँव अनेकों पाश हैं ||

शिकन भाल ,घाव उर, लिए हुए लाचार हैं |

बह रही है देश मेरे , ये कौनसी बयार है ||

देश नोच रहे हैं गिद्द से, जो सत्तासीन हैं |

विडम्बना तो देखिये, भ्रष्ट आज कुलीन है ||

नाख़ुदा जो नहीं, उनके हाथों ही पतवार है ||

बह रही है देश मेरे , ये कौनसी बयार है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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