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देखिये हम भी कैसी , यह ज़िद ठाने बैठे हैं |

जो अपने हैं नहीं, उनको अपना माने बैठे हैं ||

मौसमे बारिश नहीं , ना ही दिन की धूप है |

घुप्प अँधेरी रात में, हम छाता ताने बैठे हैं ||

ना रही इबादत आशिकी, इक चलन हो गई |

देख लीजिये हर गली, हजारों दीवाने बैठे हैं ||

आँख के आंसू ने यह, सागर से हंसकर कहा |

तुझसे बहुतेरे तो , मेरे अन्दर खजाने बैठे हैं ||

चूकते हैं और जगह , सही कभी लगते नहीं |

दिल पे ही ना जाने क्यूँ, सीधे निशाने बैठे हैं ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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