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गर लब्ज़ जुबां  पर आ जाते,

दिल की ना हालत यह होती |

मरते ना घुट – घुट कर अरमां,

आँखें ना छुप – छुप कर रोती ||

होठों  को  हया की  बंदिश ने ,

रोक दिया , कुछ कह ना सके |

जुस्तजू-ए-खज़ाना खामोश लुटा ,

ये अश्क नहीं, हैं दिल के मोती ||

तुम इल्ज़ाम वफ़ा पर मत देना ,

जो होकर भी तुम्हारे न हो पाए |

कुछ किस्मत थी, कुछ मजबूरी ,

ए काश ये सब, बस मेरे होती ||

है अब दर्द , उम्र भर हिस्से में ,

कह भी ना सकें,सह भी ना सकें |

तुम समझ सको तो, लेना समझ,

कैसे पिजरे में बंद, बुलबुल रोती ||

तुम गैर कहो , हमें लाख  मगर ,

पर दिले आबाद, तुम्हारी यादें हैं |

हम जी तो रहे हैं, पर इस तरह,

हंसती है हालत , हसरत रोती ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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