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होते सरे राह हैं कुछ चर्चे , तो कुछ बयां नहीं होते |

इस ज़माने में बर्बादी के , अफ़साने कहाँ नहीं होते ||

सुना है हमने ये अक्सर, कि दीवारों के कान होते हैं |

होती जुबां भी काश जो उनके, हम तन्हा नहीं होते ||

जाते हम भी हो संगदिल, लगाया दिल को ना होता |

तो लगे गहरे ये ज़ख्मों के, इस पर निशां नहीं होते ||

वफ़ा थोड़ी भी गर वो मेरे , निभा कर साथ जो जाते |

ज़माने में हमारी नाकामी के, यूं चर्चे बयां नहीं होते ||  

कहने को बहुत कुछ था, मगर इक पल ना कह पाए |

होती जो ना मजबूरियाँ हम पे, हम बेजुबां नहीं होते ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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