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मोहक शब्दों का जाल नहीं, ना तन का ही आकर्षण है |

भाव प्रीत की गंगा का , प्रिय सिन्धु ह्रदय समर्पण है ||

अपना जिसको मान लिया, निज, पर का फिर भेद कहाँ |

हो जाते एक परस्पर दो, ये तो निश्छल,निर्मल अर्पण है ||

उन्मुक्तता उर भाव प्रबल, है बसता ले उत्कट अभिलाषा |

जहाँ बंधते प्राण प्रफुल्लित हो, ये वो मनभावन बंधन है ||

सौरभ शीतल प्रियकर पावन, निज गुण धर्म विभूषित जो |

भुजंग गरल प्रभाव शून्य, ये सुर भाल सुशोभित चंदन है ||

धर्मों की डगर अनेकों जग में, शंकित भ्रमित करने वाली |

श्रद्धा समर्पण विशवास लिए, ये सच्ची ईश आराधन है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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