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बेखता

सतत आँखों से अश्कों की, नदी खामोश बहती है |

बंद सोने के पिंजरे में, ये बुलबुल कष्ट सहती है ||

तुम भूल कर भी बेवफ़ा, मुझे हरगिज नहीं कहना |

खता ना थी कोई  मेरी, ये रो रो कर हीर कहती है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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