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मेरे उर की पीर तुम्ही हो, इस पागल रांझे की हीर तुम्ही हो |

अच्छी-बुरी जैसी भी हो, पर मेरी मनभावन तकदीर तुम्ही हो ||

तुम ही चंचल सी बहती सरिता , सागर सी गम्भीर तुम्ही हो |

रवि का आतप भी तुम प्रिये , पावस शीतल समीर तुम्ही हो ||

प्रीत समर्पण राधा का तुम , मीरा की लगन अधीर तुम्ही हो |

तुम मधुवन मेरे मन की , और पावन यमुना तीर तुम्ही हो ||

इस दिल की धड़कन भी तुम, आँखों का बहता नीर तुम्ही हो ||

झंकृत करती दिल साजों को, रंग प्रीत भरी तस्वीर तुम्ही हो ||

मधुमास खिलाती उर उपवन, फागुन का रंग अबीर तुम्ही हो |

मेरे भावों में हरदम रहती, मेरी मनभावन तकदीर तुम्ही हो ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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