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the_sad_man_with_a_box_by_shixt-d6201lc

घाम है घनी, छाँव नाम है नहीं, अधखुले नैन मींचते |

हैं चले जा रहें अनवरत , लाश ज़िन्दगी की खींचते ||

कुछ कही, अनकही, देखिये मर रही, हसरतें हजार हैं |

रह रहे हैं संग स्वजनों, पर परस्पर ना स्नेह, प्यार है ||

प्रतिक्षण रिसते घाव, आपसी दुराव, लबों को भींचते |

हैं चले जा रहें अनवरत , लाश ज़िन्दगी की खींचते ||

कलुष मनों में फैलता, तम निशा सी घेरता, प्रचण्ड है |

आत्मीयता, अपनत्व, संग ममत्व भाव खण्ड-खण्ड है ||

मौन तुलसी खडी, पल रही नागफणी, निज कर सींचते |

हैं चले जा रहें अनवरत , लाश ज़िन्दगी की खींचते ||

अब अशोक ना, बबूल बिखेरते शूल, हरेक राह राह में |

कभी नेह से मिले,कट रहे वो गले, स्वार्थ की चाह में ||

भर रहे कपट घट, देखिये हर तरफ़, नेह पात्र रीतते |

हैं चले जा रहें अनवरत , लाश ज़िन्दगी की खींचते ||

कल बना मनुज, कल बनाने की धुन, अमिट प्यास है |

कल ना पल पड़े, पथ वो चल पड़े, जहाँ महज त्रास है ||

उमंग ना चाव है, दिल गहरे घाव है, जी रहे खीझते |

हैं चले जा रहें अनवरत , लाश ज़िन्दगी की खींचते ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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