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लाख जतन हर बार किये, पर

कैसी  ये किस्मत हाय मिली |

छाता लिए फिरते ही रहे,  पर

ना बरसात हुई, ना धूप खिली ||

दुल्हन से सजाये थे अरमां, और

ख़्वाबों  के अंगना थी  शहनाई |

पर मासूम सनम ने खून किया ,

डोली ना उठी, मय्यत निकली ||

सहरा सा सुलगता दिल ये रहा ,

लू , बातें ज़माने  चलती रही |

हम पावस  आस में  बैठे रहे ,

बिन बरसे गई वो सावन बदली ||

काँटों  से  ज़ख्मी  जो  होते ,

हम रंज  रत्ती भर  ना करते |

पर घायल तो गुल के हाथों हुए,

वो पंखुड़ी नाज़ुक, नश्तर निकली ||

हम हर बार  वफ़ा से भरते रहे,

उल्फ़त का कटोरा ना भर पाया |

जो भी  मिला  कर  छेद गया ,

नीम रही सब, ज़ुस्त्ज़ूयें दिली ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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