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व्हाट्सएप है बन रहा, एक नया अब रोग |

अहर्निश रहे देखते , वाह- चाह में लोग ||

होती  अपव्यय ऊर्जा , बाधित  सारे कर्म |

पहले आप  निभाइए , आभारों  का धर्म ||

जन पीड़ा, अनुभूति निज, हो जाती है गौण |

होड़ लगी रहती यही , प्रथम दाद दे कौन ||

कहीं अनर्गल चैट है, कहीं सृजन के चोर |

बांस चढाते लोग तो , दिखते चारों ओर ||

अंट शंट कुछ भी लिखो, निश्चित मिलती वाह |

फिर क्यूँ रचना धर्म की , लोग करे परवाह ||

कुछ गुनिजन भी हैं मगर, केवल वे अपवाद |

उनका लेखन समझे बिन, देनी है, दे दाद ||

ग्रुप अनेकों यहाँ चले, सब में पोस्ट रिपीट |

मेमोरी  फुल न होवे , करते  रहो डिलीट ||

लिखने की दरकार ना, सिम्बल की भरमार |

अवसर देख टिकाइए , चुकता  करें उधार ||

विनय आपसे है यही, इक सिम्बल से वाह |

त्रुटी नज़र  आवे कहीं , तो दें अवस सलाह ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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