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मुख मयंक, लोचन तड़ित, रस को अधर लजात |

मलयज महक , केसर वर्ण , इनको तेरा गात ||

नैन नशीले, सरस लब , आनन मद भरपूर |

 रसिक प्यास बुझती नहीं, अचरज होय जरूर ||

 देखत नैना ना थके, मिटे न मन की प्यास |

 बरबस चित है खींचती , प्रिय तुम्हारी हास ||

 कुंतल काले, गोर मुख , मनो घटा सँग चंद |

 चातक आतुर प्राण को , पल पल दे आनंद ||

 रस गागर, नागर नवल , रसिक, कविजन प्राण |

 अद्भुत, अनुपम एक तुम, विधि कर का निर्माण ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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