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पीर ह्रदय दारुण प्रबल, जग से कही ना जाय |

देह दीमक विरहा लगी , भीतर भीतर खाय ||

मन उमंग, मधुमास रितु, रही चहूँदिस छाय |

बिन साजन मुझको सखी, रंग एक ना भाय ||

सावन बदरी झूम के , बरसी फेर लजाय |

मुझ नैना देखी झड़ी, अब ना बूँद गिराय ||

लोग कहें हैं अनल सब , देती सहज जलाय |

मैं जाने किसकी बनी, ये तन जला न पाय ||

रूचि अनुरूप रची विधि, बिछुड़त बैर निभाय |

विरह अंक किस्मत लिखे, पल पल सो तडपाय ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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