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छीजत तन छिन छिन रहे, ग्रहण लगे है ज्ञान |

शील नाश करता सकल, मानव मन अभिमान ||

“मैं”  मर्यादा  मारता, “मैं ” हरता  है  मान |

मूल अमंगल है सकल, मानव मन अभिमान ||

कलह, कलुषता, क्रोध अरु, है कटुता की खान |

सर्व नाश सामान है , मानव मन अभिमान ||

नदिया धार कगार को , करती चुप नुकसान |

पतन करे न पता चले, मानव मन अभिमान ||

बैर, बुराई, ग्रन्थि मन, अपयश अरु अपमान |

इनका भागी कर बना , मानव मन अभिमान ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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