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तनिक नहीं संतोष भाव, अति पाने की अभिलाषा है |

पाकर होती और प्रबल, ये अनबुझ अर्थ पिपाशा है ||

जीवन राही भूले से, इस डगर अगर इक बार चला |

रूपहली छलना के हाथों, जाता सहज ही वह छला ||

नर पड़ पाश फरेबी में, हो जाता उसके वलियत है |

तृष्णा जाल पड़ा पग फिर, हो ना पाता उन्मुक्त है ||

माया वशीभूत मनुज के, होती ना और जिज्ञाषा है |

पाकर होती और प्रबल, ये अनबुझ अर्थ पिपाशा है ||

दौड़ निरंतर वह रहता, क्षुधा, शयन, रस, रंग भूले |

शुष्क मरू उर आँगन में, डलते कब सावन के झूले ||

विमुख जगत, स्वजन से, मृग-तृष्णा उसे लुभाती है |

उत्कंठा और अधिक पाने की, प्रतिपल रहे सताती है ||

छोर ना माया मिलता है, अंत आती हाथ हताशा है |

पाकर होती और प्रबल, ये अनबुझ अर्थ पिपाशा है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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